देवीप्रसाद चला गया...

  
   हम सबके बीच से देवीप्रसाद चला गया। लेकिन अकेले नहीं गया। अपने बच्चों के सिर से पिता का साया, अपनी पत्नी की मांग से सिंदूर, रोती—बिलखती, तड़पती मां से उसके दिल का टुकड़ा और सीने पर हाथ धरकर गर्व से अपना सीना चौड़ा करने वाले पिता का आसरा भी अपने साथ समेटकर ले गया। बदले में भी कुछ दे गया। जाकर पूछें करुमहूं गांव के उन लोगों से जिनके बेटे, पति, बच्चे या पिता उनकी ख्वाहिश या घर की जरूरतें पूरी करने निकले हैं चंद घंटे में आने का वादा करके। जी हां! वह दहशत दे गया। वह दहशत जो अब घर कर गया है उनके मन के कोने—कोने में। हादसे बताकर नहीं आते ये सच है। पर इस गांव में हादसा बिना बुलाए दस्तक दे रहा है। किसी को रुपए—पैसे का लालच देकर तो किसी से जोर—जबरदस्ती करके, बेपरवाही के साथ.. शासन—प्रशासन को अपनी जेब में ठूंसकर।



    हम लोग यहां उपरी तौर पर सरकार के सब्जबाग दिखाने लायक कुछ बदलाव की आस जरूर महसूस कर रहे हैं। मसलन, एनएच के दायरे में आने से हम भी विकास के नक्शे के किसी कोने में जरूर नजर आएंगे, शहर का सफर आसान होगा, रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी आदि—आदि। पर बदले में जख्म कितना गहरा मिलेगा वह देवीप्रसाद ने दिखा दिया। यह वह सच है जो नंगा होकर अब हुंकार भर रहा है कि आने वाले समय का कुचक्र पूरे गांववालों को लपेटे में लेने वाला है। कारण यह कि शासन—प्रशासन और उसकी शह पर उनकी नाक के नीचे तीन का पांच करने वाले ठेकेदार और उसके मातहत काम करने वाले ड्राइवर, मुंशी, चपरासी हमारे लिए नहीं बल्कि विकास के लिए काम कर रहे हैं और करते रहेंगे। उस विकास के लिए जो कल तक पागल हो गया था और अब हत्यारा भी हो गया है। अवैध मुरुम खदान से ओवर लोडिंग और बेपरवाही से ड्राइविंग तक का विकास तो हमने भुगत लिया। अब इंतजार है तो बस उस समय का जब इसी एनएच सड़क पर धड़धड़ाते हुए हजारों वाहनों का काफिला गुजरेगा।
तब उसी हत्यारे विकास की लपलपाती जीभ के दायरे में कभी गुपचुप का सामान लेने निकला कोई त्रिभुवन होगा तो अपनों को देखने लौटता कोई संदीप होगा। खैर ये तो आमदरफ्त के हादसों की आशंकाओं वाली बात हो गई जिसमें भावावेश में आकर मैंने अपनों को भी समेट लिया। लेकिन असल बात तो उससे भी कई गुना ज्यादा खतरनाक है, आम सोच के दायरे से भी बढ़कर। करुमहूं की आधी आबादी की थाती, उनके जीवन का आसरा खेती तो सड़क के इस पार रह जाएंगी। आषाढ़ से अगहन के बीच जुताई, बोंवाई, मताई, लुवाई क्या—क्या काम नहीं हैं जिन्हें इस पार ही निपटाने होंगे। खुद ही नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी, अपने बाल—बच्चों, पास—पड़ोस के भाईबंद और मवेशियों को साथ लेकर। अब डर बस इसी बात का है कि जब विकास की सड़क ने इस गांव के लिए एक डिवाइडर तक नहीं छोड़ा है उस पर धड़धड़ाती गाड़ियां भला क्यों रुके अपना कीमती वक्त जाया करने, जैसे देवीप्रसाद के लिए नहीं रुकी थी...।


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