जमीन तलाशनी हो तो अपना गड्ढा खुद खोदें...

      


      अपना गड्ढा खुद खोदना, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना जैसे न जाने कितने मुहावरे हैं जिन्हें बचपन से नकारात्मक संदर्भों से जोड़कर सिखाया जाता रहा है। इसका फायदा कितनों को हुआ यह तो नहीं जानता, लेकिन कुछ बातें आपको बताना चाहूंगा जिसके बाद आप भूल जाएंगे अपने बच्चों को ऐसी तालीम देना। जी हां, horlics से भी ज्यादा बलवर्धक और detol से भी hygienic बातें हैं। अरे भाई ये मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि वो जमीन कह रही है, जो गवाह रही है अपने ऊपर के उस मानव के विशिष्ट मानव बनने के। अब और कहीं की क्या, अपने गांव karumahun की ही क्यों न सुनाऊं। नाम था उसका बुधारू। अपनी जात तो शायद केंवट बताता था। एक बार अध्यक्ष भी मनोनित किया था उसे हमारे गांव के केंवट समाज के लोगों ने। सरपंच था कुर्मी समाज का मनसुखलाल। एक बात तो बताना भूल ही गया था मैं। गांव में कुर्मी जात वाले जहां धन-बल से इठलाते थे तो केंवट जात वाले संख्या-बल से इतराते थे। दोनों जातों में आए-दिन गुत्थमगुत्था, जूतमपैजार आम बात हो गई थी। तो कुल जमा बात यह है कि बुधारू मछली मारने कम, दूसरे की जाली या गिलेट से चुराने ज्यादा जाता था। वो भी अपने ही जात वालों की। केंवट चुप रहते थे, क्योंकि कुर्मी लोगों और मनसुखलाल के खिलाफ सबसे ज्यादा आग वही उगलता था। और तो और, बीच बाजार में मनसुखलाल की ऐसी-तैसी करते उसकी मां से करीबी रिश्ते की बातें भी यदा-कदा उसके सामने facebook की तरह share कर देता था। मनसुखलाल के तलुए चाटने वाले जब मनसुखलाल से टोंकाटाकी करने को कहते तो मामले को हाईपावर कमेटी तक ले जाने की बात तक कहता, लेकिन फिर शांत हो जाता। इस बीच पंचू कुर्मी ने आखिरकार हाईपावर कमीशन तक बुधारू के मछली चोरी के किस्से पहुंचा ही दिए। आरोप तय हुआ, कमीशन में पैरवी हुई, एक सुनवाई हुई, दो सुनवाई हुई। पंचू के पैर के तलवे फट गए पर चोरी साबित होने का नाम न ले। एक दिन मुझसे रहा ही नहीं गया तो मुंह उठाके सीधे बुधारू के पास ही चला गया। ‘कइसे कका, गांव के बघवा तोर कस मुसुवा के पार नई पावत हे। का बात ए।’ उसी उठाए मुंह से पूछ डाला। तड़ाक् से मेरे कनपट्टा को पहले सारा फिर कहना शुरू किया। बेटा आगे बढ़ना हे त ताकाझांकी कम कर आउ अपन गड्ढा खुद खोद। देख फेर सत्ता कइसे साथ देथे। वो तब है और ये अब है। इस पहेली को बुझाते इतने साल बीत गए कि मुझे क्या सारे गांव को पता ही नहीं चला कि बुधारू कब अपना नाम बदलकर जगिया बन गया और उसका मामला राज्य से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच गया। सोशल मीडिया में भी सर्वाधिक ट्रोल आजकल यही मामला कर रहा है कि मछली चोरी बुधारू ने की है या नहीं। सरपंच का फोन आए दिन पंचू के पास घनघनाते रहता है। अब मैं ठहरा गांव का गंवार, आप पढ़े-लिखे वर्ग के बुद्धिजीवी लोग ज्यादा जानते होंगे असलियत। मैं तो सिरा ही नहीं पा पाया लेकिन सूत को पकड़कर यही कहना चाहता हूं कि अपनी जमीन मजबूत करनी हो तो अपना गड्ढा खुद खोदो। चाहे वह जमीन हमें जिंदगी जीना सिखाए या राजनीति का ककहरा... 

हो सकता है अगला बुधारू आप हों...

2 comments:

  1. बढि़या हे, बुधारू के जय. स्‍वागत है भाई.

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद भैया...

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