पहिली पानी

कहते हैं कि विदेशों में कामचोर भूखे मरते हैं तो भारत में दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने वाला किसान भूख से दम तोड़ता है. उस किसान के लिए पानी और बारिश क्या अहमियत रखते हैं यह हम सभी जानते हैं. किसान और पानी के बीच के इसी रिश्ते को समझने की कोशिश है पहिली पानी. कीमती वक्त निकालकर एक बार जरुर पढ़िएगा.

              बंशी को—आॅपरेटिव बैंक से सीधे अपने खेत आ गया था। घर जाकर अपनी घरवाली धनकुंवर के आगे मुंह दिखाने का साहस उसमें न था। क्योंकि मैनेजर ने आज जैसी जिल्लत उसके साथ की थी, वैसा गोविंद ने भी अपने कर्ज की वसूली के समय न की थी। सीधे पड़िया को खूंटे से खोलकर ले गया था।
             बिसंभर के मेंढ़ से उसका खेत और कुंदरा (झोपड़ी) सीधे दिखता है। वह डिलवा (टीले) पर चढ़कर कुंदरा को देखने लगा। चंदवा भैंसा तो अपने खूंटे से बंधा था, लेकिन टिकला गायब था। पचहत्थी को एक हाथ से चढ़ाकर कमर में खोंसते हुए वह दौड़ पड़ा। बबूल की छड़ी ने उसके पैरों तले रौंदाते हुए तीन—चार कांटे चुभा दिए, लेकिन बदहवास होकर दौड़ रहे बंशी को उसकी जरा भी भान न थी। पास देखकर चंदवा ने सिर हिलाकर मानों उसे सलामी दी और आं... करके आवाज लगाई। तब तक बंशी उसके पास पहुंच चुका था। प्रत्युत्तर में उसने चंदवा को गले से लगा लिया और टिकला के खूंटे को देखा। गेरवा टूटकर लंबाई में पड़ा हुआ था और टूटे हिस्से में बना फुंदरा टिकला के गेरवा के साथ के संघर्ष को दिखा रहा था। और समय होता तो वह खूंटे से जिस दिशा में गेरवा पड़ा रहता उससे अंदाजा लगा लेता कि छूटने के बाद वह किस दिशा में गया होगा। लेकिन भिं​डी के पलिया में उसके खूर के निशान और रौंदाए पौधों से स्पष्ट हो रहा था कि उसने पहले मनभर भिंडी के पत्ते खाए हैं, उसके बाद रफूचक्कर हुआ है। बिना अवसर गंवाए वह उसकी खोज में निकल गया।
               बैंक वाली घटना से तनाव अभी दूर हुआ नहीं था कि इस नए वाकये ने उसे झकझोर दिया था। लगती असाढ़ में पानी गिरा नहीं था, आधा असाढ़ बीतने के बाद भी हरहराती दोपहर थी और उसका मुंह मारे प्यास के चोपिया रहा था। साफा जिसे वह पगड़ी बनाकर सिर पर लपेटता है वह भी शायद बैंक में चौकीदार से उलझते हुए कहीं गिर गया था। खुले सिर वह बहरानार की ओर उतर गया। मंगलवार का दिन होने के कारण टिकला के बहककर भागने का ज्यादा डर था, क्योंकि कुटीघाट बाजार जाने के लिए सुबह चार बजे से दोपहर तक दलाल के आदमी गोंहड़ा (झुंड) लेकर जाते हैं। उनके साथ जाने पर किसी के हाथ लगने का खतरा रहता है। भटकते—भटकते लिमवाही तालाब तक पहुंचा। मेढ़ पर चढ़ते तक एक उम्मीद यहां उसके होने की बनी हुई थी। चढ़ने के बाद नजर घूमाई तो कम से कम छ: जोड़ी भैंसों का झुंड उसे दिखा। उनके आगे—पीछे बालवृंद डंडा—पचरंगा खेल रहे थे। टिकला जैसी दोहरी काठी वाला भैंसा उसी झुंड में उसे दिख गया। बांछें खिल गई और कान में खूंची ठूठी बीड़ी भी उसने ​इत्मीनान से निकाल लिया। राख को झाड़ते हुए कमर से माचिस निकाली और सुलगाकर धुएं छोड़ते हुए भैसे के पास आया।
            'टिकला.. आ.. अ्आआ..।' पास आते हुए हांक लगाई तो वह भैसा पलटा ही नहीं, जिसे वह अब तक टिकला समझ रहा था। बेसब्री में वह तालाब की दरार वाली भूरभूरी मिट्टी में तेज—तेज चलने लगा। सिर दिखा, मुड़ा—तुड़ा। टिकला के सिंग को तो वह तेल पिला—पिलाकर चिकना कर चुका था। कुछ पल के लिए निकली उम्मीद की किरणें ओझल हो गई थीं और उसी बीच बंशी हपटकर गिरते—गिरते बचा था।
             'बच्चों मेरे भैसा को देखे हो क्या? माथे का थोड़ा सा बाल सफेद है।' बंशी ने बच्चों से पूछा।
             'टिकला भैंसा को पूछ रहे हो क्या बड़े ददा?' एक बच्चे ने आश्वस्त भाव से जवाब की जगह खुद सवाल पूछा।
             'हां—हां, देखे हो क्या?'
             'हां, मनहरन बबा के भैसे से लड़ रहा था तो उन्होंने उसे दो डंडा जमाकर भगा दिया, इस खार की तरफ भागा है।'  उंगली के इशारे से बच्चे ने जिस दिशा में बताया वह कोटमीसोनार के खार से लगा था।
             बंशी उसी दिशा में टिकला की खोज में निकल गया। रास्ते में कोटमीसोनार से भैसा चराने आए कई लोग मिले, हर झुंड देखी, हर आदमी से पूछा। किसी—किसी ने जानकारी भी दी। दो—तीन तालाब में भी जाकर देखा। किसी में पानी क्या, कीचड़ तक सूख चुका था। तब तक प्यास काफी बढ़ चुकी थी। तेज धूप ने उसे और बेहाल कर दिया। अब उसमें एक कदम भी आगे बढ़ने का साहस नहीं रह गया था। कुछ पल सुस्ताने के इरादे से मउहा (महुआ) के एक बड़े पेड़ के नीचे बैठ गया। अब तक चलते हुए केवल कान के बाजू से ही पसीने बह रहे थे। सुस्ताने बैठा तो पूरे शरीर भर से रोम—रोम पानी छोड़ने लगे। सिर पर बेखयाली सा चढ़ने लगा। दो—चार बार लंबी—लंबी सांस ली और दोनों हाथ पीछे की ओर करके इत्मीनान से उधर ही झुक गया।
             दिमाग का घोड़ा फुरसत के क्षणों में ही बेलगाम होकर दौड़ता है। मन अच्छा हो तो जंगल—पहाड़ को रौंदते हुए निकल जाता है। वहीं जब आफत की घड़ी में मन की गहराइयों को कुरेदते हुए गहरे रसातल में औंधे मुंह गिरने जैसा भान कराता है।
            जिस पर पहले से ही सत्तर हजार हजार का कर्ज चढ़ गया हो और फसल को मौसम मार जाए उस बंशी को मेवा—मिष्ठान, राजा—रानी का ख्वाब आने से रहा। प्यास से गले की धौंकनी चलने लगी। सच में पानी बिन सब सुन। हां, औरों के लिए बस पीने के लिए। क्योंकि दूसरे काम निपटाने के लिए तो बस जरूरत की ही चीज है पानी। पर किसान को तो फसल के लिए पल—पल पानी चाहिए, क्योंकि उसकी जान फसल में ही बसती है और फसल की जान पानी में। बोनी के समय थोड़ा कम, बढ़ने पर झिरसा (छिटपुट) पानी आना ही चाहिए। फिर रोपा के लिए खेत टम—टम ले (पूरा) भरा होना चाहिए। फसल कटते तक मिट्टी से रस नहीं जाना चाहिए। पीने के लिए क्या, नरवा—झोरका का पानी भी जी जुड़ा देता है।
           नंदिनी बहन की बातें उसे याद आने लगी। उसके जैसे गांव के पंद्रह किसानों को लेकर सिंचाई विभाग के दफ्तर में बैठ गई थी। फिर बड़े साहब को ऐसा भाषण पिलाया कि सात पुश्तें याद रखेंगे बेटे के। वह बारिश को मानसून कहती है। कहती है जैसे एक कहानी में राजकुमारी की जान तोते में बसती थी वैसे ही किसान की जान मानसून में बसती है। तोता उड़ा मतलब किसान की जान गई। उसकी दगाबाजी किसान के पूरे कुनबे को लील लेता है। उसे लाख खुशियां दे दे वह एक तरफ, अषाढ़ का पहला पानी गिरने से मन जितना हुलसता है वह खुशी एक तरफ। फैक्ट्री वालों को उपकृत करने और किसानों के साथ नहर के पानी को लेकर खिलवाड़ करने पर उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट में निपटने की धमकी तक दे डाली थी उसने।
            विचारों का काफिला अचानक उसे बारह साल पीछे धकेल दिया। अपने बच्चे गनेश के साथ वह भी बच्चा ही तो था जब उसके बाप बुधराम ने तीस हजार का कर्जा, दो बहनों का ब्याह और घर—गृहस्थी का सारा भार उसके कंधे पर छोड़कर उसी के जांघ पर सिर रखकर प्राण त्यागे थे। उसकी कंजूसाई को देखकर बेचारी धनकुंंवर के पैरपट्टी पहनने का साध साध बनकर ही रह गया था। तब बंशी कहता था मेरे बाप को मरने दे धनकुंवर फिर करना अपना शौक पूरा। और इन बारह सालों में पैरपट्टी दिलाना तो दूर, पिछले साल उसके नाक की फुल्ली तक पानी साल पटाने के लिए गिरवी चढ़ चुकी थी। एक साल की खेती में ही जान गया था कि उसका बाप चवन्नी तक को अपने पैबंध लगी मटमैली बंडी के खिसे पर कसकर क्यों रखता था। पिछले कर्जे का आधा छूटाया नहीं था कि दोनों बहनों की शादी में पुराने कर्जे का सवाया और बढ़ गया। फिर उसके भी बच्चे बढ़ने लग गए नई—नई मांगों के साथ। पिछले साल गनेश की शादी की तब अपने नाम और कर्जा चढ़ाकर भी वह उसे संतुष्ट नहीं कर पाया। कहता था, कर्जा तो लिए ही हो, तो बारात बस की जगह ट्रैक्टर में क्यों ले जा रहे हो। बंशी उस दिन जीतकर भी हार गया था। तब से वह रात में घर में नहीं सोता। खेत में ही टिन का शेड लगवाकर वहीं टेड़ा से कुंए का पानी पलो—पलोकर भांटा—पताल, रमकेलिया को जिलाते हुए पड़ा रहता है। यहां रहने से उसका मन भी हरा रहता है। बारिश में जब बूंदें टिन पर पड़कर पट—पट, पट—पट की आवाज लगाती है तो उदास मन खिल—खिल जाता है।
            इसी सोच के बीच उसे गले में कुछ खटकने जैसा एहसास हुआ। कुछ लंबी—लंबी सासें ली तो कुछ—कुछ बदहवासी छंटी। अब वह आज के बारे में सोचने लगा। आज भी वह कितनी उम्मीद के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का पैसा मिलने की उम्मीद के साथ को—आॅपरेटिव बैंक गया था। चपरासी का हाथ—पांव जोड़ने पर मैनेजर से मिलने दिया। एक—एक बात बताई। पिछले साल सोसायटी में धान बेचा था तो पांच परसेंट बदरा (बिना बीज वाला धान) में कट गया। खाद—बीज का पैसा काटकर हाथ में पंद्रह हजार आया था। यूको बैंक से चालीस हजार का कर्ज लेकर अपने बड़े लड़के की शादी की है। इसी फेर में इस बार वह क्रेडिट कार्ड के मार्फत को—आॅपरेटिव बैंक से कर्ज नहीं ले पाया। फसल बीमा के समय पटवारी से लेकर समिति सेवक तक उसके लगवार (हितैषी) बन गए थे। आज सबके सब उसकी मदद क्या, पहचानने तक से इनकार कर दिए। यही कारण रहा होगा शायद धनकुंवर के बड़े भाई के मउहा के पेड़ पर फंदा डालकर फांसी पर झुलने का। पानी के एक कतरे तक से मोहताज बंशी की आंखों में न जाने कहां से नमी आ गई और तिरछा सोने की वजह से पानी कान की ओर ढल गया।
          अब उसने साहस जुटाकर खुद को उठाया। जब तनकर खड़ा हुआ तो चारोंओर धरती गोल—गोल घूमने लगी। उसने फिर हिम्मत जुटाई और एक कदम आगे बढ़ाया। अब उसके लिए संभलना मुश्किल था। जुते हुए खेत पर वह औंधे मुंह गिर गया और माथे से खून बहने लगा। ऐसी विपत भरे हालात में भी उसे बस यही खयाल आया कि पहिली पानी गिर जाता तो उसका काम बन जाता।
          इधर, शाम के चार बजते तक घर में किसी को भी बंशी की हालत की भनक तक नहीं लगी। चार बजे तब धनकुंवर ने गनेश को उसके कमरे के बाहर से आवाज लगाई। तीन बार पुकारने पर फुनफुनाते हुए उसने जवाब दिया, जवाब क्या दिया सारा जहर उगल दिया, 'चैन से सोने तक नहीं देती अम्मा, बैंक का पैसा पाया होगा तो भट्ठी में दारू पीते बकबका रहा होगा। घरवालों की फिकर होने से रही।'
           धनकुंवर का जी अब चटपटाने लगा। इसे सोने से फुर्सत नहीं और ननकू को खेलने से। वह बंशी के साथ बैंक जाने के लिए निकले पूरन के घर चली गई। पूरन अपने घर के सामने ही खड़ा मिल गया। पूरन ने बताया कि दोनों एक बजे ही गांव आ गए थे। बस्ती के बाहर ही वह खेत निकल गया था। उनकी बातें सुनकर एक बालक धनकुंवर के पास आया और बोला, 'बड़े दाई, तुम लोगों का टिकला भैंसा गंवा गया है। बड़े ददा को लिमवाही तालाब में खोजते हुए देखा था फिर वो कोटमी खार की तरफ चले गए।'
           बच्चे की बात सुनते ही धनकुंवर की हवाइयां उड़ गईं। गिरती—भागती घर की ओर दौड़ गई। तब तक गनेश उठ गया था और ननकू भी घर पहुंच गया था। रोती—हकलाती पूरी बात बताई। तब लड़कों के भी होश ठिकाने आए। सभी खार की खाक छानने निकल गए। घंटेभर की तलाश के बाद बंशी उन्हें कोटमी खार में औंधे मुंह पड़ा दिख गया। गनेश ने उसके शरीर को हौले से पलटाया तो माथे का घाव दिख गया, जिसमें से बहा हुआ खून सूख चुका था। अब बारी धनकुंवर के साथ गनेश और ननकू के जी सुकसुकाने की थी। वह सुकसुकाया भी, साहस कर गनेश ने बंशी के सीने पर हाथ रखा। जान अभी बाकी थी। धनकुंवर को रोना नहीं आया बल्कि बंशी के पास ही रटपटाकर गिर गई। ननकू अपने साथ टिफिन में पानी लेकर आया था। गनेश ने बंशी के मुंह में पानी डाला। तब तक मोहल्ले के और लोग भी आ गए थे। उन्होंने धनकुंवर को संभाला। तीन लोगों ने मिलकर बंशी को उठाया और घर की ओर दौड़ पड़े। दो लोग धनकुंवर के होश आने पर उसे कंधे का सहारा देकर चल रहे थे। रोती—गाती घर तक पहुंची।
            बंशी की जान तो बच गई, लेकिन आज तीन दिन हो गए उसने आंख नहीं खोली है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में लू के मरीजों की संख्या बढ़ने पर अस्पताल के कर्मचारियों ने उसे वार्ड से निकालकर दूसरे कक्ष में सुला दिया है। यहां पक्की छत की जगह मात्र टिन का शेड लगा है, जिसके ऊपर नीम की घनी छाया है। धनकुंवर बंशी के बाजू में बैठकर पूरे दिन पंखा करती रहती है। ननकू बीच—बीच में खाना लेकर आता है और गनेश बंशी को प्राइवेट अस्पताल ले जाने के लिए पैसे का इंतजाम करने की बात कहकर दो दिन से नहीं आया है। इस बीच रिश्तेदारों का आना—जाना भी लगा था। उन्हीं के लाए सेब—मुसंबी का रस बंशी के मुंह में डालती रहती है। रस गले से उतरता भी है कि नहीं क्या पता, लेकिन ग्लूकोस का बाटल पूरे दिन चढ़ा ही रहता है।            
            इसी बीच धनकुंवर की बड़ी भौजी उजली साड़ी पहनी हुई आई। रूप—रंग देखा, दोनों नाक में मोटी—मोटी नग लगी फुल्ली, चवन्नी जितनी बड़ी टिकली, आंखों में मोटी—मोटी काजल की परत सब नदारद थे। रिश्तेदारभर में पुराने बनाव—सिंगार के मामले में कभी जिसकी तुती बोलती थी आज वह बेजान खंडहर की भांति डोल रही थी। शरीर ढल गया था और चेहरे की चमक भी। तो क्या गनेश के बाबू के न रहने से उसकी भी यही हालत होने वाली है। मन में अनायास ही आए इस खयाल मात्र से धनकुंवर को लगा कि उसने अपने ही सिर पर रखे पत्थर को अपने पैर पर पटक दिया हो। अपनी भौजी के गले लगकर वह अस्पताल में ही दहाड़ें मारकर रोने लगी। सब ढांढस बंधा रहे थे, लेकिन वह बेसूध होती जाती थी। फिर घुटने पर हाथ धरकर उस पर अपना सिर टिकाए जमीन पर बैठ गई। उसके भैया को फांसी पर झूले छै महीना भी नहीं ​बीते हैं कि उसके घर पहाड़ टूटने को आ गया है।
              धनकुंवर एक बात अच्छे से जानती है कि उसके घर की हालत ऐसी ही रहनी है जैसी है, चाहे बंशी रहे या न रहे। डॉक्टरों की बातें भी उसने सुन रखी है कि ऐसी हालत में मरीज के ठीक हो जाने पर भी लंबे दिन तक जीने की सम्भावना नहीं रहती। पर मन कहां मानता है, पहाड़ तोड़ने वाले को उसकी चोटी नहीं दिखती। वह तो बस अपनी छैनी—हथौड़ी में ही मगन रहता है। धनकुंवर भी अपने बंशी को लेकर ऐसा ही सोच रही है। कैसे भी करके एक बार तो होश में आ जाए फिर भगवान तक से लड़कर वह उसे जिलाएगी। अपनी भौजी जैसी हालत अपनी और अपने घर की नहीं करनी है।
            अचानक बाहर जोर की आंधी शुरू हो गई, हवा का झोंका अंदर तक पहुंच रहा था। उसी समय डॉक्टर बंशी को इंजेक्शन लगा रहा था। तीन दिनों बाद पहली बार सुई चुभने की पीड़ा से जब बंशी ने अपने नितंब के मांस को सिकोड़ा तो धनकुंवर के मन में घंटियां बजने लगी कि सरमंगला दाई ने उसकी सुन ली है। डॉक्टर ने भी उसे ढांढस बंधाया। इतने में शेड पर पट—पट, पट—पट की आवाज आने लगी। धनकुंवर समेत सबने कहा पानी गिर रहा है। बंशी के शरीर में हलचल तेज हो गई। धनकुंवर उसके सिरहाने तक चली गई। बंशी की आंखें तो बंद ही थीं, लेकिन कुछ बोलने के लिए जबड़े हिलने लगे थे। ले—देकर दो शब्द ही फूटे, 'पहिली पानी'। डॉक्टर ने कम्पाउंडर से तत्काल कुछ उपकरण और दवा लाने को कहा. जब वह बाहर निकला तो देखा नीम की निबौलियां शेड पर गिरकर पट—पट की आवाज लगा रही थीं।
                            ------------------------------------

No comments:

Post a comment