इस सीने में भी धड़कता होगा एक दिल

     
हाल ही में मैंने सर्वश्रेष्ठ हिंदी कहानियां (२०००-२०१०) पीडीऍफ़ फोर्मेटमें वंदना राग की लिखी कहानी यूटोपिया पढ़ी है, जिसमें एक दक्षिणपंथी विचारधारा से अतिरंजित नवयुवक की कुंठाओं को सरल ढंग से अभिव्यक्त किया गया है. कहानी पढ़ने के चंद रोज बाद १४ फरवरी अर्थात प्रेम दिवस उर्फ़ संस्कृति को लाठी से हांकने वालों की भाषा में ओछी पाश्चात्य संस्कृति के नग्न प्रदर्शन का दिन था. इस दिन मेरे साथ एक मजेदार अनुभव हुआ. हुआ यूँ था कि पूरे दिन जहाँ कानन पेंडारी, बिलासा ताल, स्मृति वन, मॉल आदि उन्मुक्त प्रेम की ऊँची उड़ान उड़ने की ख्वाहिश लिए पहुंचे प्रेमी युगलों से आबाद था, तो दूसरी ओर सड़कों पर खुद को भारतीय संस्कृति का पुरोधा कहने वाले नवयुवकों की बाइक रैली निकली थी. ये कभी मॉल में पहुचकर वेलेंटाइन डे स्पेशल पार्टी का बैनर-पोस्टर फाड़ते तो कभी कानन पहुंचकर युगलों पर आँखे तरेरते. मानों पाकिस्तान से दाखिल हुए आतंकवादियों की तलाश करने की जिम्मेदारी सरकार ने इन्हें ही दे रखी हो.
      रात के समय मैं प्रेस में कम्प्यूटर पर बैठकर ख़बरें पढ़ने की अपनी जिम्मेदारी निभा रहा था. तभी एक गोल-मटोल चेहरे वाला नवयुवक एडिटोरियल कक्ष में धडधडाते हुए दाखिल हुआ. पीछे ऑफिस का गार्ड चला आ रहा था. लड़के की उम्र वही रही होगी २२-२३ के आसपास. आते ही पहले तो सम्पादक महोदय से दुआ सलाम किया. फिर वेलेंटाइन डे पर दिनभर में भारतमाता की तथाकथित भक्ति में कमाए पुण्य पर आधारित विज्ञप्ति को छपवाने की डिमांड करने लगा. एक से दूसरे हाथ होते हुए वो विज्ञप्ति मेरे हाथों में पहुंची. लड़के की एक परेशानी तो दूर हुई. अब रह गया फोटो का टेंशन जो उसके मोबाइल पर था. नेटवर्क प्रोब्लम के चलते वो वाट्सएप पर मुझे फोटो नहीं दे पा रहा था. उसने अंतिम आजमाइश के तौर पर मुझे अपना फोटो ब्लूटूथ से देना तय किया. पेयर करने के फेर में उसने जैसे ही झुककर अपना मोबाइल नीचे किया, मुझे उसका स्क्रीन दिखने लगा. एक इमेज था जिसे वो ब्लूटूथ से शेयर करने सलेक्ट किया हुआ था. हाथ में सांस्कृतिक डंडा लहराते दूसरे युवाओं के बीच वो युवक भी खड़ा था. लेकिन मेरा ध्यान उसके ठीक ऊपर वाले फोटो पर चला गया. सुर्ख आभा लिए बड़ा सा इलेक्ट्रोनिक दिल धक-धक धडक रहा था. उसके ठीक ऊपर वेलेंटाइन डे का मैसेज लिखा था. पूरा पढ़ तो नहीं पाया, लेकिन लब्बोलुआब प्रेम पर ही आधारित था. मैंने एक नजर युवक के चेहरे पर फिराई. लाठी-डंडे व उन्माद की भाषा बोलते रहने वाले जुबान के ऊपर गढ़े शक्ल में मुझे मासूमियत छिपी नजर आई जो अब भी अंतिम साँसें लेते हुए जी रही थी. एकबारगी मैंने पलटकर उसका सीना देखने लगा. सोच रहा था कि क्या इसके अंदर भी कोई दिल धड़कता होगा, क्या कोई अनजानी सूरत इसे भी परेशान करता होगा. कुछ देर बाद लड़का चला गया. फिर हल्के-फुल्के मजाक के माहौल में मैंने दिल वाली बात सबको बताई. सभी हंस रहे थे. इसी बीच मैंने एक भैया से पूछ ही लिया कि भैया ये वेलेंटाइन डे मनाके संस्कृति बचाने निकला रहा होगा या लौटने के बाद मनाया होगा. भैया भी डेढ़सयाने निकले, बोले- अबे इनका अगला दिन रिजर्व रहता है. और सभी ठठाकर हंस पड़े..

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