हां मैं दल-बदलू हूँ

               हां मैं गाँव का वही गंवार हूँ, जिसे गरीबी की सोंधी मिटटी ने जहां ममत्व का खजाना दिया तो उसी ने वो औकात भी दिखाया जहां से महलों की एक-एक सीढ़ी कदमों को बौना कर देता है. कोरबा में बीते बचपन के भोर की धुंधली शहराती यादों के साथ गवई के ठेठ मिजाज को जीता आया हूँ मैं. अब आप ही बताइए कि ऐसा आदमी भला कैसे नार्मल इंसान बन सकता है जो विषम को सम मानकर भोगा भी है और उसे बदकिस्मती मानकर उस पर रोया भी है. इतनी उलझनों के बीच मन स्थिर रहना और किसी को परमानेंट इष्ट और दूसरे को दुष्ट कहना संभव नहीं. घर के आत्मिक माहौल और प्यार ने मुझे कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा (तुष्टतावादी नहीं न जो अब साफ़ चश्मे से दिखने लगा है) से इश्क कराया और तो बार-बार मल्गुझिया खानदान का वारिश होने की पिलाई गई घुट्टी ने भाजपा के गौरव (दक्षिणपंथी नहीं जो खुली आँख से दिख रहा है) का हुश्न दिलाया. इसी इश्कबाजी के चक्कर में मैं दल-बदलू कब से बन गया मुझे पता ही नहीं चला. अब चूँकि मैं आम आदमी से ताल्लुकात रखता हूँ तो मेरे भी तो वही आम सपने रहेंगे न. सपनों के क्या कहने, हम मैंगो पीपुल्स को सस्ता भी चाहिए सुंदर और टिकाऊ भी चाहिए, कैसे मिलेगा भला हमें ये सब एक ही स्टोर पर. इसलिए घूम-घूमकर खरीदते हैं. भई राजीव गाँधी की सरकार ने जो 52वें सम्विधान संशोधन में दल-बदल कानून बनाया है वह खास लोगों के वास्ते है. हम फालो करने लगे तो सत्ता परिवर्तन कैसे करेंगे और लोकतंत्र का मतलब ही क्या रह जाएगा.
                         अब थोडा प्रोफेशन और व्यक्तिगत विचारधारा की ओर भी झाँक लिया जाए. मेरी औपचारिक पढ़ाई और पत्रकारिता की प्रोफेशनल पढ़ाई के बीच का दौर भी अनगढ़ खयाली में बीता है. टीवी पर शूट-बूटधारी टीवी एंकर और तोप मुकाबिल नहीं तो अख़बार निकालो की चौपाई बांचने वाले पत्रकार को पार्टी प्रेम और जाति-धर्म से परे उठकर आम आदमी के वास्ते कलम घसीटते देखा था. तब सोचता था कि ये प्रोफेशन में जैसे पेश आते हैं व्यक्तिगत जीवन में भी ऐसी ही सोच रखते होंगे. मैं तब तक मुगालते में रहा जब तक कि उन सहपाठियों के विचार नहीं सुन लिए जो मेरे साथ पत्रकारिता की नई फसल के रूप में तैयार हो रहे थे. किसी पर मोदी, हिंदुत्व और राम मन्दिर का भूत सवार था तो कोई फक्कड और निरा कम्युनिज्म की बातें करके उनके हर उलझे-सुलझे कार्यों को जायज की कसौटी पर कसते थे. कुछ कांग्रेसी चेले भी थे. सबकी आँखों में अंधभक्ति की पट्टी बंधी देखी तो मैं हतप्रभ रह गया. विचारधारा की बातें थीं पर पूर्वाग्रही. ऐसी आँखों में ये सभी आम आदमी की बातें करेंगे और कर्तव्य, अधिकार, स्वतन्त्रता, समानता, एकता, अखंडता, स्वाभिमान के मुद्दे उठाएंगे. मुझे इस बात की संतुष्टि थी कि दल-बदलू होने के नाते मुझे इसमें कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी. मुद्दे के हिसाब से श्रेष्ठ विचारधाराओं को चुनते जाऊँगा और मन को ठेस भी नहीं पहुंचेगा.
               आज जब मीडिया के महारथियों के व्यक्तिगत ब्लॉग पढ़ता हूँ और टीवी, अखबार में उनके पाठ्य व दृश्य अवतार को देखता हूँ तो दोहरी छवि स्पष्ट दिखने लगती है. मुझे मीडिया पर मुद्दों को लेकर उनके द्वारा निभाई जा रही निरपेक्ष भूमिका उनकी मजबूरी जैसी दिखने लगती है. इस मामले में मेरी दल-बदलू छवि काम आती है और मजबूरी का कभी एहसास ही नहीं होता. इसी के नाते मुझे न तो बीजेपी के संस्कृति-प्रेमी विचारधारा से एलर्जी है और न कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता से. इसी बहाने अति को चावल के बीच पड़ी गोटियों की तरह बीनने की सहूलियत भी रखता हूँ.

अंत में             

इन दिनों मोदी का चेला बन बैठा हूँ क्योकि उसने मुझे वादा किया है कि कुम्भ के मेले में गुम चुके मेरे दोस्त विकास को वो ढूंढ़कर लाएगा. जहां तक राज्य की बात है, तो आपकी नजर में कोई बेहतर विकल्प नहीं है क्या, जो किसानों का हक मारकर वादाखिलाफी करने का काम न करे. कांग्रेस उत्तराधिकारी होता पर वहां तो सास-बहू सीरियल ही चल रहे. कोई और विकल्प हो तो बताइए. नहीच मिलेगा तो कोई जोर-जबरदस्ती भी नहीं है, आईपीएल के बाद खाली बैठने से बेहतर है कि उकताकर ही सही सास-बहू सीरियल ही देख लें...

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