मेरा संक्षिप्त जीवन परिचय

कलम का एक नन्हा सिपाही हूं, जो जाने अनजाने मुझसे जिंदगी के फलसफों और अनुभवों को कागज से मेल कराकर नए-नए कैनवास बनवाते रहता है। मेरा बचपन कोरबा जैसे शहर से लेकर करुमहूं(karumahun) जैसे छोटे से गांव के सिवाने से भी दूर बियाबान में भी बीता है। कभी बस्ती के यारों की टोली से संबंध रहा तो कभी भाठापारा का एकांत माहौल। इस एकांत माहौल ने जहां मुझे अंतर्मुखी दिशा में मोड़ा वहीं मेरे अंदर के रचनाकार को बाहर निकालने का काम भी किया। जितना मुझे इस बात की खुशी है कि एकांतता ने मेरे अंदर के रचनाकार को जिंदगी दिखाई उतना ही गम इस बात की भी है कि बदले में उसने मुझमें कुसमायोजन को भी जगह दे दी, जिससे मुझे बाहर आने में अलग से समय लगाना पड़ रहा है। लेकिन एक न एक दिन मैं बाहर निकलने में जरुर सफल रहूंगा। रही बात जिंदगी के लमहों को परिचय के टाइमलाइन में सेट करने की तो सोंच रहा हूं कि क्या लिखूं और क्या छोड़ूं। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं, इसलिए त्याग का अहसास है मुझे। आप भी सोंच रहे होंगे कि छोटों को क्या त्याग करना पड़ता है, तो सभी छोटे भाईयों से पूछिएगा कि उन्होंने कौन सा त्याग किया है, जिसकी कीमत चुकाने के लिए उन्हें जिंदगी का काफी समय और अवसरों को देना पड़ा है। जी हां कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का त्याग। बाबूजी की सीमित आय ने हम तीनों भाईयों को एक साथ पढ़ने की इजाजत नहीं दी। जब मैं आठवीं में था, तब बड़े भैया ने हम दोनों भाइयों को पढ़ाई में धकेलकर हमें जिम्मेदारियों से वंचित कर दिया और सारी जिम्मेदारियों को हथिया लिया। अब मौका मेरे मंझले भैया का था। उन्होंने भी मेरे नवमीं कक्षा में पहुंचते तक बची-खुची जिम्मेदारियांे पर कब्जा कर लिया। मैं अभागा जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से वंचित होकर पढ़ाई के मकान में कैद कर दिया गया। उस पर ताला लगाने का काम मेरे जरुरत से ज्यादा झुठी जिम्मेदारी और कर्तव्य के दिखावे ने किया। मैं पढ़ाई को अपनी जिम्मेदारी मानकर दोस्तों, सहपाठियों और क्रिकेट, खो-खो, बांटी जीत जैसों से अपने आपको अलग कर लिया। जिंदगी की गाड़ी पढ़ाई और मेरे लगाए ताले के साथ चलता रहा। अकेला आदमी जो जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से आजाद हो उसे खयाली लड्डू खाने को नहीं मिलेंगे तो भला और किसे मिलेगा। मैं भी पुस्तकों और पत्रिकाओं के सहारे लेखन की दुनिया से होते हुए स्क्रीप्ट राइटर से होकर निर्माता निर्देशक बनने की राह पर अपने भविष्य को जाते हुए महसूस किया। इसी के मद्देनजर बारहवीं और काॅलेज की पढ़ाई मुझे औपचारिकता लगने लगी। तब मैंने सभी के समझाने के बाद भी आर्थिक स्थिति के आधार पर सीमित दूरी तक ले जाने वाले विषय गणित को चुना। क्योंकि मुझे आखिर में कला में ही ग्रैजुएशन जो करना था। सो मैंने जिद करके गणित विषय ले लिया। लेकिन यही औपचारिकता मेरा एक साल भी छिन गया और मैं गणित में खयाली दूनिया के चक्कर में बारहवीं में अटक गया। अपने ख्वाबों को जुबां की देहरी में लाने की हिम्मत तो नहीं थी, सो मैंने घर की देहरी लांघना ज्यादा मुनासिब समझा और 2006 की गर्मी में एक रात मुंबई व्हाया अमृतसर जाने की सांेचकर तकिए में एक पत्र दबाकर निकल पड़ा। लेकिन विचारों के मंथन के बीच रत्न यह निकला कि मैं बिलासपुर स्टेशन पहुंचकर अमृतसर को आगे के लिए टालकर रुकने की स्कीम बनाने लगा। इस बीच रोटी, कपड़ा और मकान व घर के बड़ों के होने का अहसास क्या होता है उनके न रहने से होने लगा। पहला काम तो यह किया कि बुक स्टाल से एक अखबार खरीदकर क्लासिफाइड का पन्ना पलटाया। मुझ अनुभवहीन के लिए गार्ड की नौकरी से ज्यादा कुशल नौकरी की उम्मीद नहीं थी। सो एक विज्ञापन देखकर उसके पते में वहां तक पहुंच गया। डेढ़ महीने की इस नौकरी से पैसा तो मुझे फूटी कौड़ी भी नहीं मिला लेकिन जिंदगी के उसूलों और जिम्मेदारियांे से रूबरू कराने की सटीक दिशा जरूर मिली। इसी दिशा से होते हुए मुझे वापस घर जाना पड़ा और कुछ दिन बाद फिर लौटना भी पड़ा। इस दौरान याद आता है वो लमहा जब मेरे अनुभवहीन मन के ख्वाबों में बेसिर पैर के उड़ान रहते थे, जिसमें अहम, क्रोध और उदासी के डेरे और उथल-पुथल भी रहते थे। याद आता है बड़े भैया के किसी बात पर समझाने पर लोटे को खेत में फेंकना, याद आता है बेबात रोना। जब परफेक्ट घर वापस पहुंचा तब तक उथल पुथल शांत होने लगा था और दिल की बातें जुबां में आने लगी थी । इसी दम पर मैंने कला विषय के साथ स्वाध्याय के माध्यम से बारहवीं उत्तीर्ण किया और अपने शिक्षकों के कला को निकृष्ट विषय कहने पर तर्क से काटने की हिम्मत कर सका। मन में शांति भले ही आई लेकिन उड़ान भला कैसे रूके हां पतंग के उस उड़ान को संभालने के लिए कोमल डोर जरूर मिल गया। मैंने स्वाध्याय से बीए करने की सोंचकर बिलासपुर का डीपी विप्र कॉलेज का चयन किया। इसी दौरान मुझे कॉलेज में बीजे एमजे जैसे नए शब्दों के बीच पत्रकारिता जैसे मेरी उड़ान के एक पड़ाव को ढुंढ लिया। फिर क्या था, ठान लिया कि मुझे करना है तो बस पत्रकारिता ही करनी है। बीजे करने की सोंचता तो तत्काल अपनी बात मुझे घर में रखना पड़ता जिसकी हिम्मत मुझमें अब भी नहीं आयी थी। सो मैंने म नही मन एमजे करने की ठान ली, क्योंकि उसके लिए तीन साल का लंबा समय जो था अपनी बात घरवालों के बीच रखने का। बीए के साथ 2007 में परसदा-गोपालनगर, लाफार्ज के उस स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का मौका मिला, जिसके सारे शिक्षक मेरे ही शिक्षक थे, भले स्कूल अलग था। दूसरे साल बाबूजी के विशेषज्ञ सलाहकारों के दबाव और मेरी बात न रख पाने की कमजोरी के चलते आईटीआई में दाखिला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन मेरे जज्बे ने भी एक अलग रास्ता निकाल ही लिया। वैसे भी झूठ का यह रास्ता अगर अपने जज्बे को मुकाम पर ले जाने के लिए हो तो मुझे कोई गलत नहीं लगता। एक हजार रुपए की फीस पटाने के बाद मैंने ड्ाफ्समेन मैकेनिक ट्रेड की क्लास बीमार पड़ने के चलते दो सप्ताह तक टालना पड़ा था। दो सप्ताह बाद जब मैं पहला क्लास अटेंड करने कोनी स्थित आईटीआई सेंटर जा रहा था, तब मेरे अंदर के आदमी ने बार-बार मुझे रोका-टोका बहुत समझाया कि देख यह तेरी जिंदगी के लिए निगेटिव साइड टर्निंग प्वाइंट हो सकता है, वापस घर आकर मैंने देरी से कॉलेज आने पर दूसरे को एन्ट्री दे देने की बात कहकर आईटीआई से अपने आपको मुक्त करा सका। इसके बाद फाइनल ईयर के साथ-साथ अकलतरा में जर्नलिज्म सपोर्टिव कम्प्यूटर कोर्स करने के उद्देश्य से एक वर्षीय डीसीए पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। इस बीच मेरे अंदर की लिखने की कुलबुलाहट कलम को घसीटने के लिए बाहर आने लगा। कोर्स और ग्रेजुएशन पूरा होने के बाद वैवाहिक बातें घर में होने लगी, तब मैंने पहली बार पूरे हिम्मत के साथ जर्नलिज्म में पीजी करने की अपनी बात को बाबूजी के सामने रख सका। जिसके बदौलत मेरी शादी की बात टालने का भरपूर मौका मुझे मिला और फिर एमएमसीजे के लिए गुरु घासीदास विवि में दाखिला लिया। यहां मुझे डाॅ प्रदोष कुमार रथ, श्री गुरुशरण लाल, डा शिवकृपा मिश्रा और श्री देवाशीष वर्मा जैसे गुरुओं का सान्निध्य मिला और मैं चल पड़ा पत्रकारिता बेस्ड लेखन को चमकाने की दिशा में। कॉलेज में आशीष , निलेश . श्रवण , कृष्णा, अनुराग, आमिर, आदित्य, पिंटू, केदार, अनामिका, रश्मि दी, स्वाति, पूजा जैसे क्लासमेट और साथी मिले, जिनके सहयोग का भी मैं शुक्रियागुजार हूँ। याद रहेगा वो कैंटिन का समोसा, मंचूरियन, चाउमीन, कोल्ड्रिंक का अनवरत दौर। श्रवण की शादी, बारात, निलेश, आशीष, आदित्य की बर्थडे पार्टियाँ क्या-क्या बताऊँ पलों को समेटने के लिए शब्द तो नहीं सामर्थ्य कम पड़ जा रहे हैं काश वो पल फिर सिमट कर वापस आ जाते। चलिए आगे बढ़ते हैं कोर्स पूरा हुआ और श्री शिवकृपा मिश्रा सर के मार्गदर्शन में पत्रिका समाचार पत्र में इंटर्नशिप किया। जिसमें मुझे अखबार में लिखने की कला को जानने का भरपूर ज्ञान हासिल हुआ। वैसे भी कला सिखने का अंत तो जिंदगी भर चलती रहती है और हमेशा अधुरी ही रहती है। इसके बाद मैं रायगढ़ के लोकप्रिय अखबार केलो प्रवाह के बिलासपुर संस्करण प्रवाह के साथ कलम के प्रवाह को दिशा देने निकल पड़ा। साल भर स्थानीय प्रकाशन वाले  अखबारों में कलम को निखारने के बाद फिर पत्रिका से बुलावा आया। फिलहाल नईदुनिया में नई मंजिले तलाश रहा हूँ। देखना है कि यह कलम मुझे कहां-कहां और किस दिशा में ले जाती है।

3 comments:

  1. स्‍वागत है मित्र, निरंतर रहें.

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  2. स्‍वागत है भाई साहब.

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  3. आलेख शुरुआती दौर के हैं, जिसमें कई व्याकरणगत त्रुटियां हैं। एक दो बार अपडेट तो किया हूं, लेकिन मूल रचना को यथावत रखने के लिए उन त्रुटियों को सुधारना उचित नहीं समझा। शायद मैं सही हूं आप समीक्षा करें।

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